नई दिल्ली, 02 नवंबर । उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान राज्य चुनाव आयोग के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें एक सिविल सोसाइटी ऑर्गनाइजेशन को राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों से पहले मतदाता जागरूकता अभियान चलाने की इजाजत देने से इनकार कर दिया गया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने राज्य चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के अनुरोध पर 48 घंटे के अंदर पुनर्विचार करें।
सोशल एक्टिविस्ट अरुणा रॉय और निखिल डे की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि राज्य चुनाव आयोग अन्य संगठनों को मतदाता जागरूकता कार्यक्रम चलाने से महज इसलिए नहीं रोक सकता, क्योंकि वह खुद भी ऐसी गतिविधियां करता है। न्यायालय ने कहा कि ऐसी गतिविधियों को रोकने के बजाय इसका स्वागत करना चाहिए।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण पेश हुए। उन्होंने उच्चतम न्यायालय को बताया कि 2004 से चलाए जा रहे इस अभियान का मकसद मतदाताओं को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के बारे में जागरूक करना है। इसमें नोटा चुनने का विकल्प भी शामिल है। इसके साथ ही इसका मकसद मतदाताओं को वोट के बदले धन या अन्य प्रलोभन लेने से रोकना भी है। उन्होंने कहा कि यह अभियान किसी उम्मीदवार का समर्थन या विरोध नहीं करता है, बल्कि इसमें छोटे समूह गांवों में जाकर लोगों के साथ बातचीत वाले इंटरैक्टिव सेशन आयोजित किये जाते हैं।
राज्य चुनाव आयोग ने इस अनुरोध का विरोध करते हुए कहा कि उन्होंने इस प्रस्ताव की जांच की है और उन्हें लगता है कि यह प्रस्तावित अभियान किसी और के इशारे पर चलाया जा रहा हो सकता है इसलिए राज्य चुनाव आयोग ने इसे इजाजत नहीं दी।
राजस्थान में पंचायती चुनाव चार चरणों में हो रहे हैं। अंतिम चरण में 14 नवंबर को जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के लिए मतदान होगा। सरपंच और पंच के लिए 16 नवंबर को चुनाव होगा। इन चुनावों में 41 जिला परिषद, 457 पंचायत समितियां और 14,403 ग्राम पंचायतें शामिल हैं।