डीयू में विभाजन के आर्थिक-जनसांख्यिकीय प्रभावों पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, राष्ट्रधर्म सर्वोपरि का संदेश

नई दिल्ली, 05 नवंबर । दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के स्वतंत्रता एवं विभाजन अध्ययन केंद्र (सीआईपीएस) की ओर से जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य) के सहयोग तथा आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आईक्यूएसी) के तत्वावधान में भारत विभाजन के ऐतिहासिक, आर्थिक एवं जनसांख्यिकीय प्रभावों पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय “धन का विभाजन, कल्याण का विस्थापन: विभाजन का दीर्घकालिक आर्थिक एवं जनसांख्यिकीय परिप्रेक्ष्य” रहा।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि अखिल भारतीय आतंकवाद विरोधी मोर्चा (एएटीएफ) के अध्यक्ष मनिंदरजीत सिंह बिट्टा ने राष्ट्रवाद, देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि बताया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक नागरिक की पहली प्रतिबद्धता राष्ट्र के प्रति होनी चाहिए। उन्होंने भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस और बलिदान को याद करते हुए अब्दुल हमीद एवं जसप्रीत सिंह अरोड़ा जैसे वीर सैनिकों के शौर्य का उल्लेख किया। साथ ही विद्यार्थियों को डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और कल्पना चावला जैसी महान विभूतियों से प्रेरणा लेने का संदेश दिया। उन्होंने युवाओं से अखंड एवं धर्मनिरपेक्ष भारत की भावना को मजबूत बनाने तथा राष्ट्रसेवा के लिए सदैव तत्पर रहने का आह्वान किया।

संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने भारत विभाजन के ऐतिहासिक एवं भौगोलिक पहलुओं पर अपने विचार रखे। बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि प्राकृतिक भौगोलिक संरचनाओं के विपरीत मनमाने ढंग से निर्धारित राष्ट्रीय सीमाएं भविष्य में संघर्ष की परिस्थितियां पैदा कर सकती हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता सीआईपीएस के अध्यक्ष प्रो. रवि प्रकाश टेकचंदानी ने की। उन्होंने विभाजन की त्रासदी से सबक लेने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने का संकल्प भी है।

उद्घाटन सत्र का शुभारंभ जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य) की शासी निकाय के अध्यक्ष प्रो. जेपी शर्मा के स्वागत संबोधन से हुआ। इसके बाद सीआईपीएस के निदेशक प्रो. रविंदर कुमार ने परिचयात्मक वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की निर्णायक घटना रहे विभाजन का ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से बहुआयामी अध्ययन आवश्यक है।

संगोष्ठी में शिक्षाविदों, प्राध्यापकों, प्रतिष्ठित अतिथियों एवं विद्यार्थियों ने भाग लिया। इस दौरान भारत विभाजन के दूरगामी ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं जनसांख्यिकीय प्रभावों पर गंभीर चर्चा की गई। कार्यक्रम का उद्देश्य विभाजन के अनुभवों और उसके परिणामों का अकादमिक विश्लेषण करते हुए नई पीढ़ी को इतिहास के महत्त्व से परिचित कराना रहा।

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